भ्रष्टाचार की समस्या का आखिरी इलाज क्या है?

आज हमारे देश में भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या बन चुका है। अक्सर हम देखते हैं कि कई नेता सार्वजनिक रूप से पूजा-पाठ, यज्ञ या अन्य धार्मिक कर्मकांड करते हुए दिखाई देते हैं। पहली नजर में यह सब देखकर आम नागरिक को यह विश्वास हो जाता है कि यह नेता धार्मिक है, इसलिए ईमानदार भी होगा।
लेकिन यहीं सबसे बड़ा भ्रम पैदा होता है।
धार्मिक दिखना और वास्तव में धार्मिक होना, दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं। कोई व्यक्ति अगर बाहरी कर्मकांड करता है, तो यह जरूरी नहीं कि उसके भीतर ईमानदारी, करुणा और सत्यनिष्ठा भी हो। असली धर्म मनुष्य के व्यवहार में झलकता है, न कि केवल उसके दिखावे में।
जब नेता धार्मिक छवि बनाकर लोगों का विश्वास जीत लेते हैं, तब अक्सर नागरिक उनके वास्तविक कार्यों पर ध्यान देना छोड़ देते हैं। यही स्थिति भ्रष्टाचार को जन्म देती है। योजनाएं अधूरी रह जाती हैं, संसाधनों का गलत उपयोग होता है, और अंत में नुकसान आम जनता को ही उठाना पड़ता है।
यदि हम इस समस्या की जड़ में जाएं, तो पाएंगे कि इसका कारण केवल नेताओं में नहीं, बल्कि नागरिकों की सोच में भी छिपा है। हम अक्सर बाहरी प्रतीकों से प्रभावित होकर निर्णय लेते हैं, जबकि हमें किसी भी व्यक्ति को उसके कार्यों और चरित्र के आधार पर परखना चाहिए।
सच्ची आध्यात्मिकता का अर्थ कर्मकांड नहीं, बल्कि आत्म-जागरूकता है। जब मनुष्य अपने भीतर के अहंकार, लालच, ईर्ष्या और तुलना को समझने लगता है, तभी वह सही अर्थों में धार्मिक बनता है। यही समझ भगवद गीता जैसे ग्रंथों में भी दी गई है, जहाँ कर्म और चेतना को सर्वोपरि माना गया है।
इसलिए यदि हमें एक ईमानदार समाज और सशक्त देश बनाना है, तो हमें केवल नेताओं से नहीं, बल्कि स्वयं से भी प्रश्न पूछने होंगे। हमें यह देखना होगा कि क्या हम सच में जागरूक नागरिक हैं, या केवल भावनाओं में बहकर निर्णय लेते हैं।
अंततः, एक मजबूत राष्ट्र वही होता है जहाँ नागरिक सतर्क हों, सवाल पूछें, और अपने नेताओं को उनके कार्यों के आधार पर चुनें—न कि उनके दिखावे के आधार पर।

Posted in Spirituality and Social Work | Tagged , | Leave a comment

वास्तविक पढाई लिखाई क्या होती है?

पढ़ना-लिखना सीखो, ओ मेहनत करने वालों
पढ़ना-लिखना सीखो, ओ भूख से मरने वालों

पहले जब यह गाना दूरदर्शन पर आता था, तो उसके साथ-साथ मैं भी गाने लगता था। तब मुझे यही समझ में आता था कि यह एक तरह से छोटे काम करने वालों—जैसे कूड़ा ढूँढने वाले, ईंट उठाने वाले या सब्ज़ी बेचने वाले—लोगों को सशक्त करने के लिए कहा जा रहा है। जैसे उनसे कहा जा रहा हो कि, “भाइयों, तुम लोग भूख से मरते रहते हो, तो कुछ पढ़ाई-लिखाई कर लो। इसकी सहायता से तुम्हें अच्छी नौकरी मिल जाएगी, और उसके बाद तुम्हारी भूख भी मिट जाएगी तथा एक अच्छी ज़िंदगी हो जाएगी।”

लेकिन आज, एग्जाम की तैयारी करते हुए जब इस कविता के बारे में आचार्य जी ने समझाया, तो एकदम से मानो मंत्र खुल गया। अब समझ में आया कि इसमें जो कहा जा रहा है वो हम जैसे अज्ञानी गँवारों से कहा जा रहा है—कि तुम संसार में जो इतनी मेहनत कर रहे हो, अपनी-अपनी भूख शांत करने के लिए, अपने अहंकार की भूख शांत करने के लिए—वह भूख इस तरह शांत नहीं होगी। आचार्य जी जिस तरह समझाते हैं, वहाँ “पढ़ना-लिखना” का अर्थ सिर्फ स्कूल की पढ़ाई नहीं है। उसके लिए तुम्हें दूसरी पढ़ाई-लिखाई करनी होगी। और वह कौन-सी पढ़ाई-लिखाई होगी? वह होगी गीता की, उपनिषदों की, दर्शन शास्त्र की, और भी जो हमारे गीता समागम सिलेबस में चल रहा है उसकी।

इसके अलावा इस कविता में आगे जो लाइन आती है , वह है

क ख ग घ को पहचानो, अलिफ़ को पढ़ना सीखो
अ आ इ ई को हथियार, बनाकर लड़ना सीखो

विद्या + अविद्या = आत्मज्ञान

इस “अलिफ़” शब्द को भी आचार्य जी ने एक वीडियो में बहुत अच्छी तरह से समझाया है। उसका लिंक नीचे दे रहा हूँ।
https://www.youtube.com/watch?v=Dpt-zBHCv7c

Posted in Uncategorized | Leave a comment

सामाजिक कार्यकर्ता और क्लाइंट के बीच विश्वास का महत्व

एक सामाजिक कार्यकर्ता को अपने क्लाइंट के साथ काम करते समय अनेक बातों का ध्यान रखना पड़ता है। जब कोई क्लाइंट उसके पास आता है, तो वह अक्सर किसी गहरी समस्या या मानसिक तनाव से गुजर रहा होता है। परंतु कई बार शर्म, भय या असुरक्षा के कारण वह अपनी सारी समस्याएँ सामाजिक कार्यकर्ता के सामने खुलकर नहीं रख पाता। इस कारण उसके साथ प्रभावी ढंग से काम करना कठिन हो जाता है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी क्लाइंट ने जीवन में कोई ऐसा कार्य किया हो जिसके कारण वह मानसिक रूप से परेशान हो, लेकिन शर्म या अपराधबोध के कारण वह उस बात को सामाजिक कार्यकर्ता से छिपा रहा हो, तो सामाजिक कार्यकर्ता उसकी सही प्रकार से सहायता नहीं कर पाएगा। इसलिए सबसे पहले आवश्यक है कि सामाजिक कार्यकर्ता क्लाइंट को यह विश्वास दिलाए कि वह जो भी बातें बताएगा, वे पूर्णतः गोपनीय रहेंगी और किसी अन्य व्यक्ति से साझा नहीं की जाएँगी।

अक्सर क्लाइंट को यह डर रहता है कि यदि वह अपनी समस्या किसी को बता देगा तो लोग उसका मज़ाक उड़ाएँगे या उसकी निजी बातों को दूसरों के सामने उजागर कर देंगे। इसी डर के कारण वह खुलकर अपनी समस्याएँ नहीं बता पाता।

मान लीजिए कि कोई पुरुष अपनी पत्नी के व्यवहार से परेशान है, क्योंकि उसे लगता है कि उसकी पत्नी उसके साथ धोखा कर रही है। इस कारण उसका मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। यदि वह व्यक्ति काउंसलिंग के लिए जाता है लेकिन शर्म के कारण अपनी वास्तविक समस्या काउंसलर को नहीं बताता, तो काउंसलर भी उसकी सही सहायता नहीं कर पाएगा। वह केवल सामान्य सलाह ही दे पाएगा, परंतु समस्या की जड़ तक नहीं पहुँच पाएगा।

इसी कारण समाज कार्य के क्षेत्र में सबसे पहली आवश्यकता होती है कि क्लाइंट के साथ अच्छा संपर्क स्थापित किया जाए। जब क्लाइंट सामाजिक कार्यकर्ता पर विश्वास करने लगता है, तब वह अपनी समस्याएँ खुलकर बताता है, और तभी उसकी वास्तविक सहायता संभव हो पाती है।

काउंसलिंग के दौरान क्लाइंट को यह भी समझाया जा सकता है कि संसार का स्वभाव ही ऐसा है कि हर व्यक्ति अपनी प्रवृत्तियों और स्वार्थों के अनुसार कार्य करता है। यदि कोई व्यक्ति हमें कष्ट देता है, तो यह उसकी प्रवृत्ति का परिणाम है। ऐसी स्थिति में या तो हमें उस व्यक्ति से दूरी बना लेनी चाहिए, या फिर उसे वैसा ही स्वीकार करना सीखना चाहिए जैसा वह है।

किसी से यह अपेक्षा करना कि वह जीवनभर हमें प्रेम, सहयोग और समझ देता रहेगा, हमेशा संभव नहीं होता। संसार में हर व्यक्ति अपनी आदतों, परिस्थितियों और मानसिक प्रवृत्तियों के अनुसार जी रहा है, और ये सब चीजें अस्थायी होती हैं—समय के साथ बदलती रहती हैं।

इसलिए अंततः मनुष्य को अपने भीतर ही पूर्णता खोजनी पड़ती है। उसे यह समझना होता है कि ऐसी कौन-सी मजबूरियाँ हैं जिनके कारण वह दूसरों पर अत्यधिक निर्भर हो जाता है। जब धीरे-धीरे यह समझ विकसित होने लगती है, तो व्यक्ति का दुख भी कम होने लगता है और वह अधिक संतुलित जीवन जी पाता है।

Posted in Spirituality and Social Work | Tagged | Leave a comment

धार्मिक अनुभव, कंडीशनिंग और सामाजिक कार्य

मान लीजिए कोई हिंदू कहता है कि जब वह मंदिर जाता है तो उसे अत्यधिक शांति का अनुभव होता है। उसे लगता है कि भगवान के दर्शन हुए, मन हल्का हो गया और भीतर सुकून मिला। परंतु वही व्यक्ति जब मस्जिद जाता है तो उसे वैसा अनुभव नहीं होता। ठीक इसी प्रकार यदि कोई मुस्लिम मंदिर जाए तो उसे विशेष आध्यात्मिक अनुभूति न हो, लेकिन मस्जिद में वह गहरी शांति और खुदा का अनुभव बताए।
यहाँ विचार करने योग्य प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में मंदिर या मस्जिद में ही शांति निहित है, या यह हमारे मन की संरचना, विश्वास और सांस्कृतिक कंडीशनिंग का परिणाम है?
मनुष्य बचपन से जिस धार्मिक वातावरण में पलता है, उसकी मान्यताएँ, प्रतीक, प्रार्थनाएँ और पवित्र स्थान उसके अवचेतन में गहराई से स्थापित हो जाते हैं। परिणामस्वरूप, जब वह अपने धार्मिक स्थल पर जाता है तो उसका मन स्वतः ही श्रद्धा और शांति की अवस्था में प्रवेश कर जाता है। यह अनुभव असत्य नहीं है, किंतु यह पूरी तरह बाहरी स्थान का गुण भी नहीं है; इसमें मन की पूर्वधारणा और भावनात्मक जुड़ाव की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
यदि एक छोटा बच्चा, जिसे अभी धार्मिक भेदभाव या पवित्र-अपवित्र की धारणाओं का ज्ञान नहीं है, मंदिर या मस्जिद जाए तो संभव है कि उसे कोई विशेष आध्यात्मिक अनुभव न हो। जैसे-जैसे सामाजिक और सांस्कृतिक शिक्षाएँ मिलती हैं, वैसे-वैसे अनुभवों की व्याख्या भी बदलने लगती है।
सामाजिक कार्यकर्ता के लिए इसका महत्व
एक सामाजिक कार्यकर्ता के लिए यह समझ अत्यंत आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक कंडीशनिंग के साथ आता है। क्लाइंट के साथ कार्य करते समय यह जानना ज़रूरी है कि उसकी मान्यताएँ क्या हैं और वे उसके व्यवहार, निर्णय और भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को किस प्रकार प्रभावित कर रही हैं।
हालाँकि, इन मान्यताओं को सीधे हटाने या चुनौती देने का प्रयास संबंध को कमजोर कर सकता है। सही दृष्टिकोण यह है कि पहले विश्वास और सम्मान का आधार बनाया जाए, फिर संवेदनशील संवाद के माध्यम से व्यक्ति को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित किया जाए। सामाजिक कार्य का उद्देश्य व्यक्ति की जागरूकता और विवेक को विकसित करना है।
जब व्यक्ति स्वयं यह समझने लगता है कि उसके अनुभवों पर उसके मन, संस्कार और पहचान का प्रभाव है, तब वह अधिक संतुलित, सहिष्णु और संवादशील बन सकता है।

Posted in Spirituality and Social Work | Tagged | Leave a comment

social work कैसे करें?

दोस्तों, अक्सर आपने देखा होगा कि जब भी आप खाली बैठते हैं, तो आपके ऊपर विचारों का प्रभाव बढ़ जाता है। उन्हीं विचारों को बार-बार याद करके आप बहुत अधिक परेशान हो जाते हैं और आगे चलकर यह डिप्रेशन का कारण भी बन सकता है। इसलिए संतों ने कहा है कि अपने आप को बिल्कुल भी अनावश्यक खाली समय मत दो, क्योंकि जैसे ही आपको खाली समय मिलता है, मन इधर-उधर भटकने लगता है।

अपने आप को सार्थक कार्यों में लगाना सीखिए। ऐसे बहुत से काम हैं जो आप कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, अपने आसपास देखिए कि क्या किसी व्यक्ति को किसी प्रकार की सहायता की आवश्यकता है। यदि आपके पास पैसे नहीं हैं, तो आप किसी अन्य तरीके से भी उसकी मदद कर सकते हैं — जैसे श्रमदान।

दूसरी बात, किसी से भी कोई अपेक्षा मत रखिए और न ही सम्मान या प्रशंसा की आशा कीजिए। अक्सर हम जो भी कार्य करते हैं, उसके पीछे यह छुपी हुई मंशा होती है कि सामने वाला हमारी तारीफ करेगा। इस सोच से बाहर आना आवश्यक है। हमें जो अच्छा लगे, वह कर दीजिए; उसके बाद कोई इज्जत दे या न दे, इससे कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए।

लगातार इस प्रकार के कर्म करते रहिए। तभी आपका मन बुरे विचारों से दूर रह सकेगा। यदि आप अपने आप को सही काम में नहीं लगाएंगे, तो मन लगातार आपको परेशान करता रहेगा।

Posted in Spirituality and Social Work | Tagged | Leave a comment

IGNOU MSW Journal Hand Written

यदि आप इग्नू से समाज कार्य का कोर्स कर रहे है तो उसमें आपको फील्ड वर्क जर्नल भी करना होता है और बहुत से छात्र कोर्स तो पूरा कर लेते है पर जर्नल तैयार नहीं कर पाते है। अगर आपको इस विषय में हेल्प चाहिए तो आप संपर्क कर सकते है। आपको फील्ड वर्क जर्नल लिखने के विषय में पूरी जानकारी दी जाएगी।

Posted in IGNOU BSW Solved Journal Download, IGNOU Field Work Guide, IGNOU MSW Counselling Block Placement Journal MSWL-047 | Tagged | Leave a comment

IGNOU BSW Solved Journal Download Hindi English Medium

Hello students,

If you are facing problems in writing your BSW journal of IGNOU BSW course, then you can contact us for solutions and guidance regarding how to prepare the journal.

Writing a journal is very much interesting time. If you want to be a good social worker, then you must complete your field work journal yourself by doing the field work training in any NGO or development agency. Here we will guide you regarding how to make the journal. We are providing journal in English as well as in Hindi medium.

List of journals available

  • BSWL-104
  • BSWL-105
  • BSWL-106
  • BSWL-107
  • BSWL-108
  • BSWL-109

For more details, you can contact us

Posted in IGNOU BSW Solved Journal Download, IGNOU Field Work Guide | Tagged , , , , , | Leave a comment

MSWL-016 Internship Journal Download

In second year of IGNOU MSW course, we have to do 30 days of internship in any agency. After that, we have to prepare the internship report. The course code of this subject is MSWL-016. In this internship work, you have to do various activities like community profile, stakeholders interview etc. If you are looking for help in the internship journal, you can contact us.

Posted in IGNOU Field Work Guide, IGNOU MSW Field Work Training | Tagged , | Leave a comment

IGNOU MSW 13 L Field Work Journal

IGNOU MSW 13 L Field Work Journal

IGNOU MSW course is a 2 year post graduate degree course. In this course, you have to do field work training, block placement and internship. If you are looking for the journals and block placement reports then you can contact us.

Posted in IGNOU Field Work Guide, IGNOU MSW Field Work Training | Tagged , , | Leave a comment