पढ़ना-लिखना सीखो, ओ मेहनत करने वालों
पढ़ना-लिखना सीखो, ओ भूख से मरने वालों
पहले जब यह गाना दूरदर्शन पर आता था, तो उसके साथ-साथ मैं भी गाने लगता था। तब मुझे यही समझ में आता था कि यह एक तरह से छोटे काम करने वालों—जैसे कूड़ा ढूँढने वाले, ईंट उठाने वाले या सब्ज़ी बेचने वाले—लोगों को सशक्त करने के लिए कहा जा रहा है। जैसे उनसे कहा जा रहा हो कि, “भाइयों, तुम लोग भूख से मरते रहते हो, तो कुछ पढ़ाई-लिखाई कर लो। इसकी सहायता से तुम्हें अच्छी नौकरी मिल जाएगी, और उसके बाद तुम्हारी भूख भी मिट जाएगी तथा एक अच्छी ज़िंदगी हो जाएगी।”
लेकिन आज, एग्जाम की तैयारी करते हुए जब इस कविता के बारे में आचार्य जी ने समझाया, तो एकदम से मानो मंत्र खुल गया। अब समझ में आया कि इसमें जो कहा जा रहा है वो हम जैसे अज्ञानी गँवारों से कहा जा रहा है—कि तुम संसार में जो इतनी मेहनत कर रहे हो, अपनी-अपनी भूख शांत करने के लिए, अपने अहंकार की भूख शांत करने के लिए—वह भूख इस तरह शांत नहीं होगी। आचार्य जी जिस तरह समझाते हैं, वहाँ “पढ़ना-लिखना” का अर्थ सिर्फ स्कूल की पढ़ाई नहीं है। उसके लिए तुम्हें दूसरी पढ़ाई-लिखाई करनी होगी। और वह कौन-सी पढ़ाई-लिखाई होगी? वह होगी गीता की, उपनिषदों की, दर्शन शास्त्र की, और भी जो हमारे गीता समागम सिलेबस में चल रहा है उसकी।
इसके अलावा इस कविता में आगे जो लाइन आती है , वह है
क ख ग घ को पहचानो, अलिफ़ को पढ़ना सीखो
अ आ इ ई को हथियार, बनाकर लड़ना सीखो
विद्या + अविद्या = आत्मज्ञान
इस “अलिफ़” शब्द को भी आचार्य जी ने एक वीडियो में बहुत अच्छी तरह से समझाया है। उसका लिंक नीचे दे रहा हूँ।
https://www.youtube.com/watch?v=Dpt-zBHCv7c