एक सामाजिक कार्यकर्ता को अपने क्लाइंट के साथ काम करते समय अनेक बातों का ध्यान रखना पड़ता है। जब कोई क्लाइंट उसके पास आता है, तो वह अक्सर किसी गहरी समस्या या मानसिक तनाव से गुजर रहा होता है। परंतु कई बार शर्म, भय या असुरक्षा के कारण वह अपनी सारी समस्याएँ सामाजिक कार्यकर्ता के सामने खुलकर नहीं रख पाता। इस कारण उसके साथ प्रभावी ढंग से काम करना कठिन हो जाता है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी क्लाइंट ने जीवन में कोई ऐसा कार्य किया हो जिसके कारण वह मानसिक रूप से परेशान हो, लेकिन शर्म या अपराधबोध के कारण वह उस बात को सामाजिक कार्यकर्ता से छिपा रहा हो, तो सामाजिक कार्यकर्ता उसकी सही प्रकार से सहायता नहीं कर पाएगा। इसलिए सबसे पहले आवश्यक है कि सामाजिक कार्यकर्ता क्लाइंट को यह विश्वास दिलाए कि वह जो भी बातें बताएगा, वे पूर्णतः गोपनीय रहेंगी और किसी अन्य व्यक्ति से साझा नहीं की जाएँगी।
अक्सर क्लाइंट को यह डर रहता है कि यदि वह अपनी समस्या किसी को बता देगा तो लोग उसका मज़ाक उड़ाएँगे या उसकी निजी बातों को दूसरों के सामने उजागर कर देंगे। इसी डर के कारण वह खुलकर अपनी समस्याएँ नहीं बता पाता।
मान लीजिए कि कोई पुरुष अपनी पत्नी के व्यवहार से परेशान है, क्योंकि उसे लगता है कि उसकी पत्नी उसके साथ धोखा कर रही है। इस कारण उसका मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। यदि वह व्यक्ति काउंसलिंग के लिए जाता है लेकिन शर्म के कारण अपनी वास्तविक समस्या काउंसलर को नहीं बताता, तो काउंसलर भी उसकी सही सहायता नहीं कर पाएगा। वह केवल सामान्य सलाह ही दे पाएगा, परंतु समस्या की जड़ तक नहीं पहुँच पाएगा।
इसी कारण समाज कार्य के क्षेत्र में सबसे पहली आवश्यकता होती है कि क्लाइंट के साथ अच्छा संपर्क स्थापित किया जाए। जब क्लाइंट सामाजिक कार्यकर्ता पर विश्वास करने लगता है, तब वह अपनी समस्याएँ खुलकर बताता है, और तभी उसकी वास्तविक सहायता संभव हो पाती है।
काउंसलिंग के दौरान क्लाइंट को यह भी समझाया जा सकता है कि संसार का स्वभाव ही ऐसा है कि हर व्यक्ति अपनी प्रवृत्तियों और स्वार्थों के अनुसार कार्य करता है। यदि कोई व्यक्ति हमें कष्ट देता है, तो यह उसकी प्रवृत्ति का परिणाम है। ऐसी स्थिति में या तो हमें उस व्यक्ति से दूरी बना लेनी चाहिए, या फिर उसे वैसा ही स्वीकार करना सीखना चाहिए जैसा वह है।
किसी से यह अपेक्षा करना कि वह जीवनभर हमें प्रेम, सहयोग और समझ देता रहेगा, हमेशा संभव नहीं होता। संसार में हर व्यक्ति अपनी आदतों, परिस्थितियों और मानसिक प्रवृत्तियों के अनुसार जी रहा है, और ये सब चीजें अस्थायी होती हैं—समय के साथ बदलती रहती हैं।
इसलिए अंततः मनुष्य को अपने भीतर ही पूर्णता खोजनी पड़ती है। उसे यह समझना होता है कि ऐसी कौन-सी मजबूरियाँ हैं जिनके कारण वह दूसरों पर अत्यधिक निर्भर हो जाता है। जब धीरे-धीरे यह समझ विकसित होने लगती है, तो व्यक्ति का दुख भी कम होने लगता है और वह अधिक संतुलित जीवन जी पाता है।